नसबन्दी





छोड़ दिए है कुछ पत्ते कुछ शाखाएँ मैंने अपनी साँसो के लिए, 
फ़ैल न जाये जड़े इनकी,पैर भी इनके बाँध दिए
 
शाखाओं पर फूल तो अब भी खिलते है, 
फूलों से फल,फल से बीज़ जमीन पर अब भी गिरते है

ये बीज़ अब मिट्टी में समां नही सकते  
भूगर्भ में नन्हे पौधे ऊगा नही सकते 

फर्श पर पड़े पानी में पेड़ अपनी देह देखता है  
 

सूखे ठूठ कब तक खड़े रहते इंतज़ार में, 
कट गए, चिर गए, पहुँच गए बाज़ार में,

सूखी लकड़ियां चिता पर संग लेटी है
 सिसकती, सुलग़ती, सोचकर मेरे न घर में बेटी है  

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