मेरी आत्मकथा या अन्तर्मन की व्यथा

होशंगाबाद 
"मेरा बचपन"

एक मासूम सी, नादान सी, भोली-भाली सी
  हरदम लगे ताज़े फूलों से लदी डाली सी

  नाचती गाती, झूमती खिलखिलाती थी
  रूठती कभी, कभी मान जाती थी

  जिददी थी नटखट थी सबको सताती थी
पढ़ाई से बचने के कई बहाने बनाती थी

एक मासूम सी, नादान सी, भोली भाली सी
  हरदम लगे ताज़े फूलों से लदी डाली सी

"मेरा यौवन"

वो प्यारी गुड़िया हो रही है सयानी
ऐसे बातें बनाती, जैसे हो सबकी नानी

वो कालेजों के किस्से,  वो नित नयी कहानी
वो अल्हड़ सी, चंचल सी, हो गयी अब शैतानी

रंगीन ख्वाबों में खोई वो रानी
वो प्यारी सी गुड़िया हो गयी अब सयानी

"मेरा परिणय"

वो प्यारी सी बिटिया डोली में बिठाया 
माता पिता ने सजन से मिलाया

अपने जिगर को पराया बनाया
परायों को अपना बनाना सिखाया

हुई वो सबकी, सबका आशीष पाया


"वो शुभ प्रसंग"

हुआ मन प्रफुल्लित, वो शुभ घडी आई
वो जीवन के गुलशन में, कलियाँ मुस्कुराई

खिला फूल नन्हा सा माँ की ममता जगाई
वो बचपन की यादें पुनः याद आई

 वो प्यारी गुड़िया मम्मी कहलाई

'नया मोड़"


उस नटखट के जीवन में, भूचाल आया

वो खुशियाँ वो उल्लास, विधि को न भाया

जीवन के सुख का, करुण अंत आया
छीना सुख सौभाग्य, प्रभु ने रुलाया

सारा ही जीवन, सिसकियों में समाया
उस नटखट के जीवन में भूचाल आया

"विशेष"


अनेक जिम्मेदारियों और संघर्षो के बीच अनवरत चलती ज़िंदगी में

वो बचपन वो यौवन, सब ना जाने कहाँ खो गया







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Comments

  1. चंद लाइनों में पूरा जीवन समेट दिया।

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