अख़बार, रात का लम्बा सफ़र तय कर अभी अभी तो पंहुचा था घर, ताज़ा खबरें समेटे बंद दरवाजे के नीचे सुस्त पड़ा था आंखें मींचे, न जाने क्यों अब भी इस पर ही इतना भरोसा क्यों है वैसे तो खबरों का सिलसिला हाथ में रखे मोबाइल में दिनभर जारी रहता है फिर भी उन ख़बरों का पन्नो पर इन्तजार रहता है, सोशल मीडिया, पर एक खबर आती है और उसके पीछे खबर का फैक्ट चेक, ऑनलाइन खबर पड़ते वक़्त मैन स्ट्रीम मीडिया की साइट पर ही अब भी भरोसा है
सुबह की खबरे वॉशरूम में फ्रेश होते वक़्त मोबाइल पर पड़ी जाती है, जबकि अख़बार बाहर हाल में पड़ा रहता है, ई-पेपर ने खबरों को कभी भी कहीं भी पढ़ने की सुविधा दी है फिर भी ऑनलाइन साइट या एप्लीकेशन पर सब्सक्रिप्शन का रोड़ा सामने आते ही कदम पीछे हट जाते है, कभी कभी सोचता हूं ऑफलाइन अख़बार बंद करके ऑनलाइन सब्सक्रिप्शन ही ले लू, सफ़र में रास्ते में खाना खाते वक़्त ट्रैन की सीट पर क्या बिछाएंगे, अलमारी में क्या लगाएंगे, उन अखबारों को बेचकर एक दिन की सब्जी खरीदी जाती है
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