सरकार चलाने से ज्यादा, सरकार बचाने का डर होता है, तब होता है मुफ्त का खेला शुरू, इस खेल में बटुआ टटोला नहीं जाता, पैसे लगाने पड़ते है, फिर चाहे बटुआ ही दाँव पर क्यों न लग जाये। पैसा बाँटने की योजनाओं से सरकार अपना भविष्य सुनिश्चित करना चाहती है, और जनता उन पैसो से अपनी रोजमर्रा की जरूरत पूरी करने की कोशिश,सरकार क्या चाहती है ये तो लगभग स्पष्ट होता है, पर जनता क्या चाहती है यह असमंजस तो चुनाव रिजल्ट तक बना ही रहता है
एक तरफ विरोधी दल इसे मुफ्त की रेवड़ी बताते है, वही अपनी सरकार आने पर दोगुना रेवड़ी बाँटने का वादा करते है। जनता की जरूरत अगर अनाज तक सीमित होती तो राशन कार्ड पर मिलने वाला दो - तीन रुपये किलो अनाज वापस दुकानों पर कोई क्यों बेचता, फिर सरकार का जनता को पैसा देकर अपनी जरूरत के हिसाब से खरीदारी करने का इरादा के अच्छे पोषण का दावा करती है , डी बी टी के जरिये जहाँ सरकार ने ये सुनिश्चित किया की पैसा सीधे लाभार्थी के हाथों में पहुँचे, वहीँ डी बी टी पैसो तक सीमित रहकर इसके अंतिम उपयोग को सुनिश्चित नहीं कर पायी
\[शराब पीती युवती का वीडियो दिखाकर विरोधी दल ये दावा करते दिखे की यह पैसा बाँटने की योजना का परिणाम है, वहीँ सरकार हितेषी भक्तगण इसका प्रमाण मांगते दिखे
शराब पीना आदत हो या किसी की जरुरत, सरकार इसे अपनी उचित मूल्य की दुकान में तो उपलब्ध नहीं करा सकती, सरकार के पोस्टरों में ये दावा किया गया, की पैसा बांटने की इस योजना ने एक माँ को अपने बच्चो को अच्छा पोषण देने में सहायता की, अब प्रमाण तो इसका भी उपलब्ध नहीं
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