रात दिन काम करने वाले युवाओं को रोजगार ढूंढ़ने से ज्यादा बेरोजगारी का ठप्पा हटाने की चिंता लगी रहती है, एक देश जिसमे सभी के पास अपने मन मुताविक नौकरी हो ये तो मुश्किल है, लेकिन मन मुताविक काम हो ये थोड़ा मुमकिन है, वो भी तब, जब युवा खुद ये निर्णय ले की उन्हें करना क्या है।
एक फिल्म आयी थी दिलीप कुमार साहब की "नया दौर", बस के आने से तांगे वालो के रोज़गार जाने और उसे बचाने की जद्दोजहत, फिल्म का हीरो तांगा चलाये या अम्बेस्डर्स जीत तो जाता ही है, पर जो इस नए दौर में अपने साथ अपने साथियों के रोज़गार ले लिए मर मिटे वो हीरो ही तो है।
नौकरी की तलाश में हारकर बैठे युवाओ ने स्टैंड अप होकर स्टार्ट अप को अपनाया है, पर अपने काम को केवल अलग होने की बजाय बेहतर बताने की चाह पहले जितनी ही है। ग्रेजुएट चाय वाले भी चाय की गुमठी को एक बिज़नेस के तरह अपने खुद के स्टॉर्ट अप के बाद ही देखते होंगे
एक लड़का पीठ पर बस्ता लाधे स्कूल जाते वक़्त गांव के चौक पर पेड़ के नीचे बैठे जुआ खेलते लोगो को देखता तो उसके ह्रदय और पैर दोनों की स्पीड बढ़ जाती, बापू कहते है की पढ़ लिखकर बहुत बड़ा आदमी बनना इन लोगो की तरह नहीं, बड़ा होकर वो बहुत बड़ा गेम डेवलपर बना उसके बनाये ऑनलाइन रमी गेम्स छोटे बड़े सब खेलते है
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