सूना आँगन

 


सूना आँगन आज भी तुम्हारा रस्ता देखता है, 

तुम आते होगे, कोहनी से पसीना पोछते, देरी का बहाना सोचते, हाथो में कुल्हाड़ी थामे, गमछे में कैरी बांधे। मुझे पता है, जूते देरी पे छोड़कर, गमछा आँगन में खोलकर, मेरे गालो को तोड़कर, तुम मुझे फिर ऊठा लोगे काँधे।

तुम आते होंगे, 

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