मास्टर की - पुरानी फिल्मो में जो अक्सर विलेन के पास हुआ करती थी, जिससे जगत के सारे ताले खुल जाते थे, कभी कभी सूदखोरों को गरीब किसानो के अंगुठे के निशान लेकर जमीन के टुकड़े अपने नाम करते देखा होगा, ये अंगुठा जो बचपन में बिना खाये पिए भूख मिटा देता था, जिसे द्रोणाचार्य ने दक्षिणा में माँग लिया वो साधारण तो नहीं ही था
आज हम ख़ुद हमारे तालो की मास्टर-की, हमारे पास रखते है, मास्टर की जो अगर किसी के हाथ लग जाये तो हमारे ख़त, तस्वीरें, पैसा सब किसी के हाथ लग जाये, ऐसा नहीं है पैसा, तस्वीरो, खत के लिए अलग चाबियाँ नहीं रख सकते, लेकिन अगर सभी चाबियों को अपने छोटे से दिमाग में रखना पड़े , जिसमे से कितनी ही चीज़ रोज़ निकाली, रखी जाती है, चाबियाँ कहीं न कहीं खो ही जाती है , इसलिए आप, हम सामान्य दिमाग़ के लोग चाबियों की छबि किसी पर्ची में बना लेते है, जो परीक्षा की घडी में काम आ सके, इस पर्ची के खोने की संभावना उस चाबी के गुच्छे से कहीं ज़्यादा होती है
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