क़ीमती बोल


एक वक़्त था, जुवां छोटी थी, स्याही सिमित थी कलम की, लोग साथ में तराजू लिए फिरते थे, बड़ी कीमत थी बोल की, लिखते भी थे तो इतनी कंजूसी से की कोई लब्ज़ जाया न चले जाये।

अब जुवां लम्बी, जगह भरपूर है, जो मन करे बोलो, जब मन करे बोलो, जिससे मन करे बोलो, गलियां भी अब तो इमोजी सी लगती है 


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