

सुषमा चौबे
अध्यापिका, होशंगाबाद
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हरी - भरी बसुन्धरा, हरे भरे ये वन। कितना सुख देते - देते हमें जीवन।
ये पवन ये पर्वत, ये झील ये गगन, हरते दुःख सबका ,करते हमे मगन।
इस धरा को हम हरा बनाएंगे, इस धरा पर वृक्ष हम लगायेंगे। यह प्रकृति उस प्रभु की देन है, इसके प्रति फ़र्ज़ हम निभायेंगे।
इसकी रक्षा करना कर्तव्य है परम। कितना सुख देते - देते हमे जीवन।
इन वनों में औषधि महान है, ये महर्षि पाराशर का ज्ञान है।
वृक्ष-आयुर्वेद नामक ग्रंथ में, जड़ी और बूटियों का ही बखान है।
चरक ऋषि की संहिता में हे बहुत ही दम। कितना सुख देते - देते हमे जीवन।
जल बिना ये जीवन सुनसान है, जल है तो जीवन है जान है।
नदियाँ ये झरने ये कूप सब, जल बिना ये सभी निष्प्राण है। जल से भरे हो ये प्रयास करते जाओ तुम। कितना सुख देते - देते हमे जीवन।
पर्यावरण प्रदूषण अभिशाप है, ऐसा कृत्य करना ही पाप है।
पर्यावरण सुरक्षा में हम सभी प्रत्यनशील हो तो क्या बात है। प्रण करो संकल्प लो पौधे लगाओ तुम। कितना सुख देते -देते हमें जीवन।
सुन्दर रचना... 🌹🌹🌹
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