प्रकृति के माथे की बिन्दी सूरज की तरह चमक रही थी, किसी के डूब जाने का इतना इंतज़ार तो कभी नहीं किया था , क्या किसी अपने के पतन को देखकर भी मन इतना खुश होता है ?
इतना नरम था सूरज की रास्ते में ही पिघल गया, धरती से मिलने से पहले आसमां ही निगल गया, और वो डूब रहा था लोग तालियाँ बजा रहे थे
कल कल करते करते हम उस तक पहुंच गए , कल कल करते करते वो हम तक पहुँच गया, पहाड़ से बहते उस झरने और झरने से बनती नदियों ने सूरज की किरणों को कभी धरती से मिलने से नहीं रोका।
पचमढ़ी भोपाल के पास होशंगाबाद से कुछ लगभग १०० कि. मी. दूर सतपुड़ा की पहाड़ियों पर बसा है , और आज की पीढी के लिए खास बात ये है की यहाँ बहुत से स्पॉट्स पर नेटवर्क नहीं रहता , नेटवर्क, कंजक्शन, भीड़ इन सब से ही तो दूर जाना चाहते है हम कभी कभी
शाम को "बेटा बाबर्ची " मे मेनू सलेक्ट करने में वक़्त जाया नहीं होता, दिन भर की थकान से जागी भूख खाने का स्वाद दुगुना कर देती है, कुछ सीमायें है जहाँ तक आपकी कार जा सकती है , उसके पार जाने वाली जिप्सी गाडी के सुहाने सफर के बाद जहाँ ये नहीं पहुँचती, पहुँचते है आपके पैर।
जिप्सी पर घूमना अपने आप में एक स्पेशल फीलिंग हैं , और ज़िप्पिंग का एहसास भी गजब है , ऊंचाई से जब आपको धीरे से धकेला जाता है , एक बार के लिए तो लगता है जैसे अब पानी में ही गिरेंगे, पर धीरे धीरे आत्मविश्वास बढ़ जाता पानी की लहरों के ऊपर से निकलना किसी चिड़िया की आंख से देखा हुआ दृश्य की तरह होता है
Posted by Sumit Gour on Saturday, February 20, 2021



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