चाहत थी, एक बार फिर स्कूल हो आयें हम
आरज़ू थी, की एक बार फिर दोस्तों संग खिलखिलाएं हम
इक्छा थी , की गुरु चरणों में नमन फिर एक बार कर आयें हम
मन में तमन्ना थी की उसी कक्षा में फिर एक बार बैठ कर, उस श्यामपट्ट पर चाक से अपनी छाप छोड़ आयें हम
एक दिल में तम्मना थी की उस मिटटी को छूकर आयें हम, जिसमे योग, घोस की लय छोड़ आये हम
सोचा था २०२० के जाते जाते ये अभिलाषा पूरी हो जायगी गुरु, शिष्य, सखा के मिलन की घड़ी यादगार हो जाएगी
इस बार भी ऐसा हो न सका , हमेशा की तरह उन यादों को ही याद कर आये हम !
अभी

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