नोटबन्दी के वो दिन भी गजब थे, दादाजी रोज़ सुबह जल्दी ही तैयार होकर बैंक के लिए निकल जाते थे, इतने उत्साह से ही कभी स्कूल पढाने भी जाते होंगे,
सहमे हुए एक दिन धीरे से बुलाकर, हमसे कहा
जे पाँच सौ के नोट बंद हो गए, कोई के पास रखे हुऐं तो का बे नोट अब बिलकुल ख़राबई हो गए ?
उनके इस सवाल में डर,बेवसी के अलावा चिंता की लकीरे थी, जो माथे की झुर्रियों के बीच छुपने की कोशिश कर रही थी
दादी ने बहुत धीरे से कहा - मेरे पास 500 के चौदह नोट है , अगर तू उन्हें बदल लाए तो दो नोट तू रख लेना।
बरसो से थोड़े थोड़े करके इकठ्ठा कर लिए थे ये अधिकांश पत्नियों की तरह। अब अगर इन पैसो के बारे दादी, दादाजी को बताती तो पैसे छुपाने का अपराधबोध था, पैसे हाथ से जाते सो अलग, खरे पसीने से भीगे उन नोटों को चूल्हे में झोंकना भी आसान न था, पर अगर किसीको नहीं बताया तो उनका कुछ दिन में कागज होना तय था
मजबूरी को ही अक्सर अवसर समझ लिया जाता है फिर वो चाहे एक ऑटो वाला हो या एयरलाइन्स,
हमने कहा - दादी दो नहीं चार नोट लगेंगे

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