आज वसुधा बड़ी उदास है, सिर्फ इंसानो से उसे आस है
कट रहे है बृक्ष ढ़िया , जमीं ही जमीं की तलाश है
बन रहे बहुमंजिला घर, जिनमे बसती जिन्दा लाश है
आज वसुधा बड़ी उदास है, सिर्फ इंसानो से उसे आस है
चाहती है प्रेम प्रकृति भी, सिर्फ हमी से तो आस है
बीज़ बोएं करें संरक्षित भी, तभी पायेंगे स्वस्थ सांस है
आज वसुधा बड़ी उदास है, सिर्फ इंसानो से उसे आस है
सिर्फ हरित हो बसुन्धरा अब, आओ यह संकल्प ले
स्वच्छ हो नदियाँ ये पर्वत, खुशियाँ हमारे पास है
आज वसुधा बड़ी उदास है, सिर्फ इंसानो से उसे आस है
बड़े-बड़े मैदानों में अब, नहीं उगती घास है
आज ही गर जाग गए हम, ज़िंदगी बिन्दास है
सुषमा चौबे

बहुत ही सुन्दर ,
ReplyDeleteदिल को छु लेने वाली पंक्तियां..!
शुक्रिया....
बहुत बढ़िया
ReplyDeletePerfect. Even good content to publish in newspaper and magazine!
ReplyDeleteThis can good enough to be tagged in "The lalantop" dunidaari show 'Latkan" segment. Make video of this poem and tag to #Latak @ https://www.instagram.com/latak.lallantop/?hl=en
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