टूटते परिवार





जितने अटूट रहे परिवार,  उतने टूट रहे परिवार। 
बाजारों की चकाचौँध में, पीछे छूट रहे  परिवार।

पश्चिम वाली परिपाटी को, जमकर लूट रहे परिवार।
अपनी ही माकुल जड़ों से बेजां रूठ रहे परिवार।

जैसे फूटा करते दाने, वैसे फूट रहे परिवार।
अपने हाथों खुद अपना ही, गला घोट रहे परिवार।

आज नहीं हैं नामोनिशाँ, जों जों ठूँठ रहे परिवार।

रूपेंद्र गौर 




Comments