शांत पर ताल नहीं, रुकावट पर जाल नहीं
ढोती हूँ मल पर नाल नहीं, उम्र मेरी कुछ साल नहीं
सदी हूँ मैं, नदी हूँ मैं
सिंचित पर नहर नही,पथ पर डगर नहीं
नदी हूँ मैं।
उठती है लहरें आक्रोश की, पर सिंधु मैं नहीं। चंचल पर झरना नहीं
सदी हूँ मैं, नदी हूँ मैं।
ढोती हूँ मल पर नाल नहीं, उम्र मेरी कुछ साल नहीं
सदी हूँ मैं, नदी हूँ मैं
सिंचित पर नहर नही,पथ पर डगर नहीं
नदी हूँ मैं।
उठती है लहरें आक्रोश की, पर सिंधु मैं नहीं। चंचल पर झरना नहीं
सदी हूँ मैं, नदी हूँ मैं।
जोतती हूँ पर हल नहीं, बुझाती प्यास पर जल नहीं
सुखकर भी
संसाधनों से लदी हूँ मै नदी हूँ मैं।
पर लावा नहीं, आस्था है मुझमे पर कावा नहीं। समा लेती हूँ नदी हूँ मैं।
सुखकर भी
संसाधनों से लदी हूँ मै नदी हूँ मैं।
पर लावा नहीं, आस्था है मुझमे पर कावा नहीं। समा लेती हूँ नदी हूँ मैं।
गुजरती हूँ पहाड़ो से, जंगलो के नजारों से, वह रही हूँ वर्षो से, पर सदी मैं नही।
नदी हूँ मैं।
सुमित गौर

Comments
Post a Comment