असुरक्षा की भावना


बच्चा जब माँ की गोद में होता है, अपने नन्हे नन्हे हाथों से माँ की साड़ी का पल्लू, कैसे जोर से पकड़ कर रखता है, इससे ये तो प्रतीत होता है की बच्चो में "असुरक्षा की भावना "जन्मजात होती है। 

अब ये हमारे ऊपर है की, इसे बढाकर बच्चे को डरपोक,कायर और भीरु बना दिया जाये या इसे ख़त्म कर बच्चे को निडर, निर्भीक और सृदृढ़ बनाया जाये, अनजाने में ही सही, बच्चे के मन में खींची गयी डरावनी तस्वीर, एक पल के लिए बच्चे को चुप कर सकती है, परन्तु अनदेखी अनजानी वस्तु के लिए पैदा किया ये डर, बालमन पर ऐसी छाप छोड़ जाता है, कि ताउम्र इसके निशान नहीं मिटते।

ये मत खाओ, वहाँ मत जाओ, मिटटी में मत खेलो, बारिश में मत भीगो, धूप में मत निकलो, ये मत करो, ये तुमसे नहीं होगा,ये कैसा दुलार जो भावी पीढ़ी को कमजोर कर दे.

"दुनिया में कौन सा काम है, जो मेरा बेटा/बेटी न कर सके" आपका ये विश्वास, आपके बच्चे में आत्मविश्वास पैदा करेगा, आखिर आप उसके अपने ही तो हो

सुषमा चौबे 

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