रोज ही की तरह आज भी फर्श पर जूतों के निशान उभर आये थे, आफिस की जल्दी में विनय अक्सर पौछा लगाती मौसी को भूल जाता , और कभी कभी तो कुछ जरूरी सामान ही अपने कमरे में भूल आता, कहता- "मौसी वो, मेरा मोबाइल, मैंने जूते पहन लिए है तो......"
मौसी- पता था मुझे में आज पहली बार नहीं आयी हूँ इस घर में, वो टेबल पर रखा है
"मौसी" वैसे महाराष्ट्र में घर का काम पर आने वाली युवती को अक्सर मौसी ही कहा जाता है, और क्यों न कहें वो होती ही है माँ जैसी।
पापा की अचानक बीमारी से मौत के बाद जब सर पर जिम्मेदारियों का पहाड़ टूटा, तब माँ को मौसी ने ही तो संभाला था, घर के खर्चे के आगे जब पैसो ने दम तोड़ दिया था तब माँ ने एक दिन कहा- "सुशीला हमे अब तुम्हारी जरूरत नहीं है, वल्कि घर के खर्चे के लिए हो सकता है मुझे ही कहीं काम पर जाना पड़े"
तब मौसी गिड़गिड़ा कर बोली थी- "मेमसाब आपही के यहाँ शुरू से काम कर रही हूँ, अब बुढ़ापे में कहाँ जाऊँगी
मेरा तो कोई अपना नहीं, तुम ही लोगों से एक रिस्ता बन गया था
पहले दिन जब मौसी नहीं आयी तब माँ उदास बैठी रही शाम तक घर के दरवाजे पर, मैं जब मौसी की झोपडी पर गया तब वह भी फाटक पर बैठी थी माँ सी - मौसी
सुमित गौर
बातूनी कैंटीन


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