बरसात की बूंदों से लूट पिटकर हाइवे किनारे ढाबे में शरण मिली।
भट्टी में कोयला पड़ा था, हलवाई ने जब फूंकनी की बीन में हवा दी तो कोयला साँप की तरह फुंकार उठा, कापता शरीर ठंडा पड़ गया, भट्टी सोने से भर गई , चाय की केटली उफन पड़ी, नदी नालों की तरह ।
बातूनी ! Canteen...



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