जागिए अभी भी देर नहीं हुई

जापान का हाल का जनसंहार पूर्णतः जलवायु परिवर्तन विज्ञान के कारण हुआ है, जो मूलतः प्राकृतिक शस्त्र विज्ञान के नाम से जाना जाता था, जिस दिन प्रिंट मीडिया द्वारा यह जानकारी में आया की इसकी मूल शक्ति मानव निर्मित विधुतीय चुम्बकीय लहरिया है, इसके दुष्परिणामों की कल्पना करना अत्यंत ही सरल हो गया था, ये दुष्परिणामों की कल्पना करना अत्यंत ही सरल हो गया था, ये दुष्परिणाम श्रंखला बढ़ है भूकंप से प्रारंभ होकर ज्वालामुखी पैदा होना, ग्लोबल वॉर्मिंग होना, ओज़ोन बर्स्ट होना, राजनैतिक भ्रष्टाचार होना, अंतर्ग्रहीय चुंबकीय संतुलन बिगड़ना से लेकर क्राइम रेट इन्फ्लेशन तक इसी विज्ञान के दुष्परिणाम हो रहे है अंततः प्रलय होना, कई अन्य सह परिणाम जैसे जीन म्युटेशन व अन्य कई नॉन रेवेर्सिबल दुष्परिणाम जो सम्पूर्ण जैव व पादप जगत पर पड़ेंगे। जैसे की यह स्वयंसिद्ध है कि अखिल ब्रहमाण्ड में चुम्बकत्व के सिवा और कोई मूल शक्ति कार्यकारी नहीं है, वैश्विक नेत्रत्व को यह गंभीरता से स्वीकार कर लेना चाहिए कि जलवायु परिवर्तन क्रिया में प्रयुक्त मानव निर्मित चुंबकीय लहरियाँ जब पृथ्वी में स्थिर, स्थित मैग्नेटिक प्लेट्स से प्रतिक्रिया करेंगी, तब छोटे बड़े भूकंप आयेंगे, यहाँ तक सुनामी भी, जबकि दूसरी तरफ इन्हे दक्छिन धुर्व से संचालित करते समय ये वहाँ से ओज़ोन व्यस्थापित करेंगी, अथार्त दक्षिण धुर्व से वांछित दिशा स्थान हेतु संचालन क्रिया के दौरान ओज़ोन व्यस्थापित होगी अन्यथा हानिकारक गैसीय उत्सर्जन विश्व व्यापी प्रतिबंधन के बाबजूद ग्लोबल वार्मिंग एवं ओज़ोन बर्स्ट में बहुत जायदा बढ़ोतरी क्यों होती ? इसके अलावा पृथ्वी से उत्पन्न होने वाली और दक्षिण धुर्व से विसर्जित होने वाली ग्लोबल इलेक्ट्रिसिटी जो पृथ्वी के आस पास (ELF)नाम से संचालित होती रहती है, वह जलवायु परिवर्तन विज्ञान के कारण छिण हो गयी है, जिससे सूर्य की किरणे अवाधित रूप से पृथ्वी पर पड़ने लगी है जिसे ये (ELF) किरणे छीन करती थी, वह क्रिया अब कमजोर पड़ गयी है, यह भी ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने में दूसरा महत्बपूर्ण कारक है, चुम्बकीये लहरियो के कारण मैग्नेटिक प्लेट्स भी गरमा रही है जिससे ग्लेसियर पिघल रहे है 

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