त्याग



पानी से भरे उस खेत में मिटटी के साथ बूढ़े घनश्याम के के पैर भी गल गए थे, पीछे से किसीके आने की आहट सुन उसने मुँह फेर लिया, और पानी को दिशा देने लगा, जैसे किसीके आने की उसे खबर ही न थी, कल ही तो कमला ने कहा था की उसका बेटा शहर से आ रहा है, सुबह से आँखों के डबरो बहते हुए उस पानी में कुछ बूंदे आँखों से झलकर मिल गयी.

यही दिन देखने के लिए पैदा किया था, खुदने दो रोटी कम खाई की बच्चों को पढ़ा लिखा दूँ तो उन्हें ये मुसीबत नई झेलनी पड़ेगी, 

ये पढ़ायी की तुमने, सारा गांव हसता है मुझ पर

बेटे के पास पापा से कहने को कुछ न था  


सुमित गौर 
बातूनी । कैंटीन 

Comments