मोक्ष


नदी के किनारे अपना कमंडल लिए बैठे बाबा के चेहरे पर एक  संतोष था, पूछने पर पता चला, दो दिन से उन्होंने भी खाना नहीं खाया हैं, पर न ही उन्हें मेरी तरह खाने की तड़प थी, न बैचेनी।

बाबा की ओर चाय बढ़ाते हुए मैंने पूछा- बाबा खाना ?
बाबा- हम तो साधू हैं, उसका नाम न ले, उसका गुणगान न करे तो अधूरा लगता है, खाना मिलेगा तो खा लेंगे नहीं तो जैसी उसकी मर्जी, अब उसके है तो जैसा वो चाहे।

मेरी दो दिन की भूक दो मिनट के लिए मर गयी, पर अगले ही पल जाग उठी। 

बाबा- यदि संसार में रहकर ही सारी इच्छाये समाप्त हो तो मोक्छ की क्या आवश्यक्ता। 
मैं- बाबा मेरी भी इच्छा होती है की दुनिया से दूर कही अकेले चले जाऊ, मेरी भी बहुत इच्छा है की मोक्छ ही मिल जाये।

बाबा- मोक्छ की इच्छा रखना भी तो इच्छा हे जिसके रहते कैसा मोक्छ।


सुमित गौर 
बातूनी। कैंटीन 





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