IRFAN : an untold story



चाय
नई वस
पीता है न तू
हां पर
ठीक है फिर ,........ समयला ,समायला
एक मिनट , मैं आता हूं
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दीवार पर लगी तस्वीरो पर उकरे उर्दू के अक्षर,इरफ़ान की पैशन के हेड पर लिखे उसके नाम से ज़्यादा कुछ अलग नहीं है,गर इन अक्षरों को समझ सकता तो वो तस्वीरें एक पोस्टर मात्र रह जाती,और इनमें खो नहीं पाता

इरफ़ान ने अपनी कुर्सी को करीब खिसकाया
अचानक
( धीमी आवाज में बड़े आराम से रखा था ये शब्द हमने घर में फैली खामोसी के बीच )

मैं खुद इंदौर में था जब अम्मी का फ़ोन आया कहा अम्मी की तबियत ख़राब है फ़ौरन घर आ जाओ, शाम को ही तो बात की थी, तबियत का पूछने पर कहते "तुम खामोख़ा पूछते रहते हो सब खैरियत है, तुम पूछ पूछ कर मेरी तबियत ख़राब मत कर देना"

रास्ते में था जब बार बार रिश्तेदारो के फ़ोन आ रहे थे तब  कुछ अंदेशा हुआ पर दिल मानने को राजी ही ना था
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इस दीवान को इतना खाली पहली बार देखा है,अब्बू नहीं तो अब्बू का सारा सामान रहता था इस पर,यू पी की उनकी अपनी आदत छूटी नहीं थी उनकी हर लिखापढ़ी के लिए अलग अलग पैन रखे थे

परदे के पीछे बच्चे चटाई पर होले के ढेर के चारो ओर घेरा बनाकर बैठे थे

अभी दीदी जीजाजी और बच्चे है तो मन लगा है सब चले जायेंगे तो घर खाने को दौड़ेगा

हुआ क्या था आखिर उन्हें ?
कुछ नहीं शाम को खाना खाकर रोज की तरह सोये थे तीन बजे उठकर वाशरूम गए  फिर सोये तो उठे नहीं उनकी मौत का उन्हें भी नहीं पता चला सायलेंट अटेक था
काश में होली पर घर आ जाता

इंदौर में जब इरफ़ान  शहर की तमाम खबरे लेकर आता था, तब में सो चूका होता था पर जो भी जागता हुआ बच जाता उसे भुगतना पड़ता था सनंने सुनाने का काफी शौक था जनाब को
खाने के दौरान नॉन वेज का ज़िक्र होना तो तय था आर्गुमेंट के टॉपिक के मुताबिक ग्रुप बनते बिगड़ते रहते थे
नॉन वेज के टॉपिक पर जब तमाम फायदे गिनाये जा चुके होते तब एक ही  बात कह पाता अगर मेरे घर वाले भी बचपन में मेरे हाथ में बोटी रख देते तो में भी आज शौक से खाता, रूम पर नॉन वेज़ कभी नहीं बनता था पर घर पर लाये नॉन वेज़ के साथ आयी रुमाली रोटी को लेने से कोई परहेज ना था

कुछ स्पेशल मौको पर इरफ़ान सिर्फ कोल्ड ड्रिंक लेकर बैठता था लेकिन आर्गुमेंट में फिर भी पलड़ा उसी का भारी होता था जितना नॉलेज इंडिया के बारे में था उतना ही दूसरे देशों का भी, पकिस्तान में पंजाबी और गुजराती बोले जाने की बात बड़ी नयी थी पर नेट पर जब गुजरती और पंजाबी रीजनल चैनल सुने तो दंग रह गया उर्दू के शब्द और गुजराती लहजा

वो दिन जब अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुनाया जाना था, इंदौर के कुछ हिस्सों के साथ साथ हमारे रूम पर भी कर्फू लगा था बातें बहस में बदल रही थी तो कभी बहस मज़ाक पर ख़तम

एक हाथ में लकड़ी पकडे लकड़ी के ही समान बुजुर्ग ने जब घर की देहलीज को लांगा तब आँखों के डबरो से आँशु झलक गए इरफ़ान ने कुर्सी से उठकर सहारा दिया और सोफे पर बैठा दिया, एक हाथ में चाय की ट्रे लिए बहन अम्मी को बाहर लायी अम्मी लड़खड़ार कर सोफे के पेरो में जा गिरी और कुछ बोल न सकी अब बस आसुओ की धार ही सब बोल रही थी, इरफ़ान को रोता हुआ नहीं देखा था कभी मैंने आज भी नहीं पर आंखें नमी  से चमक रही थी

चाय का मग लिए इरफ़ान उठा "अम्मी ज़्यादा गम मत कीजिये  बरना तबियत ख़राब हो जायगी"

"चलो बाहर चलते है" इरफ़ान ने मेरी ओर मुड़कर कहा में कुर्सी लेकर आता हूँ

घर के किनारे पर स्ट्रीट लाइट के नीचे पत्ते खेलने वालो का जमावड़ा था,दीवारों पर रंगो की रैलिया बिखरी पड़ी थी गलियों में दौड़ रहे बच्चों के चेहरे पर हल्का रंग रह गया था स्कूल के दिनों मे दोस्तों की टोली ने जब इरफ़ान के यहाँ धाबा बोला तब अब्बू के कहने पर ही इरफ़ान घर से निकला था फिर तो जो हालत हुई  थी की अब्बू ने पहचानने से इंकार कर दिया था

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